(
(कवित्त)
)
जंह ध्रुवधर्म कर्मछय लच्छन, सिद्धि समाधि साधिपद सोई ।
सुद्धपयोग जोग महिमंडित, साधक ताहि कहै सब कोई ॥
यौं परतच्छ परोच्छ रूपसौं, साधक साधि अवस्थादोई ।
दुहुकौ एक ज्ञान संचय करि, सेवै सिववंछक थिरहोई ॥१६॥