
जाकै पद सोहत सुलच्छन अनंत ज्ञान,
विमल विकासवंत ज्योति लहलही है ।
यद्यपि त्रिविधरूप विवहारमैं तथापि,
एकता न तजै यौ नियत अंग कही है ॥
सो है जीव कैसीहुं जुगतिकै सदीव ताके,
ध्यान करिबेकौं मेरी मनसा उनही है ।
जाते अविचल रिद्धि होत और भांति सिद्धि,
नाहीं नाहीं नाहीं यामैं धोखो नाहीं सही है ॥२१॥