+ ज्ञाता की अवस्था -
((सवैया इकतीसा))
कै अपनौं पद आप संभारत,
कै गुरु के मुख की सुनि बानी ।
भेदविज्ञान जग्यो जिन्हिकै,
प्रगटी सुविवेक-कला-रसधानी ॥
भाव अनंत भए प्रतिबिंबित,
जीवन मोख दसा ठहरानी ।
ते नर दर्पन ज्यौं अविकार,
रहैं थिररूप सदा सुखदानी ॥२२॥