
भैया जगवासी तू उदासी ह्वैकैं जगतसौं,
एक छ महीना उपदेश मेरौ मानु रे।
और संकलप विकलपके विकार तजि,
बैठिकैं एकंत मन एक ठौरु आनु रे।
तेरौ घट सर तामैं तूही है कमल ताकौ,
तूही मधुकर ह्वै सुवास पहिचानु रे ।
प्रापति न व्हैहै कछु ऐसौ तू विचारतु है,
सही ह्वै है प्रापति सरूप यौंही जानु रे॥३॥