
परम प्रतीति उपजाय गनधरकीसी,
अंतर अनादि की विभावता विदारी है ।
भेदग्यान द्रष्टिसौं विवेक की सकति साधि,
चेतन अचेतन की दसा निरवारी है ॥
करम कौ नासकरि अनुभौ अभ्यास धरि,
हिएमैं हरखि निज उद्धता सँभारी है ।
अंतराय नास भयौ सुद्ध परकास थयौ,
ज्ञान कौ विलास ताकौं वंदना हमारी है ॥२॥