+ भेदविज्ञान का परिणाम -
((सवैया इकतीसा))
जैसैं करवत एक काठ बीच खंड करै,
जैसैं राजहंस निरवारै दूध जलकौं ।
तैसैं भेदज्ञान निज भेदक-सकतिसेती,
भिन्न भिन्न करै चिदानंद पुदगलकौं ॥
अवधिकौं धावै मनपर्यै की अवस्था पावै,
उमगिकै आवै परमावधि के थलकौं ।
याही भांति पूरन सरूप को उदोत धरै,
करै प्रतिबिंबित पदारथ सकलकौं ॥१४॥