+ ज्ञाता का विलास -
((सवैया तेवीसा))
या घटमैं भ्रमरूप अनादि,
विसाल महा अविवेक अखारौ ।
तामहि और स्वरूप न दीसत,
पुग्गल नृत्य करै अति भारौ ॥
फेरत भेख दिखावत कौतुक,
सौंजि लियैं वरनादि पसारौ ।
मौहसौं भिन्न जुदौ जड़सौ,
चिनमूरति नाटक देखन हारौ ॥13॥