(
(सवैया इकतीसा)
)
प्रथम अज्ञानी जीव कहै मैं सदीव एक,
दूसरौ न और मैं ही करता करमकौ ।
अंतर-विवेक आयौ आपा-पर-भेद पायौ,
भयौ बोध गयौ मिटि भारत भरमकौ ।
भासे छहौं दरबके गुन परजाय सब,
नासे दुख लख्यौ मुख पूरन परमकौ ।
करम कौ करतार मान्यौ पुदगल पिंड,
आप करतार भयौ आतम धरमकौ ॥२॥