जाही समै जीव देहबुद्धिकौ विकार तजै,
वेदत सरूप निज भेदत भरमकौं ।
महा परचंड मति मंडन अखंड रस,
अनुभौ अभ्यासि परगासत परमकौं ॥
ताही समै घटमैं न रहै विपरीत भाव,
जैसे तम नासै भानु प्रगटि धरमकौं ।
ऐसी दसा आवै जब साधक कहावै तब,
करता ह्वे कैसे करै पुग्गल करमकौं ॥3॥