
जैसैं उसनोदकमैं उदक-सुभाव सीरौ,
आग की उसनता फरस ज्ञान लखियै ।
जैसैं स्वाद व्यंजनमैं दीसत विविधरूप,
लौनकौ सुवाद खारौ जीभ-ज्ञान चखियै ॥
तैसैं घट पिंडमैं विभावता अज्ञानरूप,
ज्ञानरूप जीव भेद-ज्ञानसौं परखिये ।
भरमसौ करमकौ करता है चिदानंद,
दरव विचार करतार भाव नखियै ॥16॥