
जैसैं राजहंस के वदन के सपरसत,
देखिये प्रगट न्यारौ छीर न्यारौ नीर है ।
तैसैं समकिती की सुदृष्टिमैं सहज रूप,
न्यारौ जीव न्यारौ कर्म न्यारौ ही सरीर है ॥
जब सुद्ध चेतन को अनुभौ अभ्यासै तब,
भासै आपु अचल न दूजौ और सीर है ।
पूरव करम उदै आइके दिखाई देइ,
करता न होय तिन्हको तमासगीर है ॥१५॥