
जैसे एक जल नानारूप-दरबानुजोग,
भयौ बहु भांति पहिचान्यौ न परतु है ।
फिरि काल पाइ दरबानुजोग दूरि होत,
अपनै सहज नीचे मारग ढरतु है ॥
तैसैं यह चेतन पदारथ विभाव तासौं,
गति जोनि भेस भव-भावंरि भरतु है ।
सम्यक सुभाइ पाइ अनुभौके पंथ धाइ,
बंधकी जुगति भानि मुकति करतु है ॥31॥