((सवैया इकतीसा))
मोख सरूप सदा चिनमूरति,
बंधमई करतूति कही है ।
जावतकाल बसै जहाँ चेतन,
तावत सो रस रीति गही है ॥
आतमको अनुभौ जबलौं,
तबलौं शिवरूप दसा निबही है ।
अंध भयौ करनी जब ठानत,
बंध विथा तब फैल रही है ॥९॥