
सिष्य कहै स्वामी तुम करनी असुभ सुभ,
कीनी है निषेध मेरे संसै मन मांही है ।
मोखके सधैया ग्याता देसविरती मनीस,
तिनकी अवस्था तौ निरावलंब नांही है ॥
कहै गुरु करमकौ नास अनुभौ अभ्यास,
ऐसौ अवलंब उनहीकौ उन पांही है ।
निरुपाधि आतम समाधि सोई सिवरूप,
और दौर धूप पुदगल परछांही है ॥८॥