
कोऊ शिष्य कहै स्वामी! असुभक्रिया असुद्ध,
सुभक्रिया सुद्ध तुम ऐसी क्यौं न वरनी ।
गुरु कहैं जबलौं क्रियाके परिनाम रहैं,
तबलौं चपल उपयोग जोग धरनी ॥
थिरता न आवै तोलौं सुद्ध अनुभौ न होइ,
यातें दोऊ क्रिया मोख-पंथकी कतरनी ।
बंधकी करैया दोऊ दुहूमें न भली कोऊ,
बाधक विचारि मैं निसिद्ध कीनी करनी ॥१२॥