((सवैया इकतीसा))
जैसैं मतवारौ कोऊ कहै और करै और,
तैसैं मूढ़ प्रानी विपरीतता धरतु है ।
असुभ करम बंध कारन बखानै माने,
मुकतिके हेतु सुभ-रीति आचरतु है ॥
अंतर सुदृष्टि भई मूढ़ता बिसर गई,
ज्ञानको उदोत भ्रम-तिमिर हरतु है ।
करनीसौं भिन्न रहै आतम-सुरूप गहै,
अनुभौ अरंभि रस कौतुक करतु है ॥16॥