
समुझै न ज्ञान कहैं करम कियेसौं मोख,
ऐसे जीव विकल मिथ्यातकी गहलमैं ।
ज्ञान पच्छ गहै कहैं आतमा अबंध सदा,
बरतें सुछंद तेऊ बूड़े है चहलमैं ॥
जथा जोग करम करै पै ममता न धरै,
रहै सावधान ग्यान ध्यानकी टहलमैं ।
तेई भव सागरके ऊपर है तरै जीव,
जिन्हिको निवास स्यादवादके महलमैं ॥15॥