((सवैया इकतीसा))
जेते जगवासी जीव थावर जंगमरूप,
तेते निज बस करि राखे बल तोरिकैं ।
महा अभिमानी ऐसौ आस्रव अगाध जोधा,
रोपि रन-थंभ ठाडो भयौ मूछ मोरिकैं ॥
आयौ तिहि थानक अचानक परम धाम,
ज्ञान नाम सुभट सवायौ बल फोरिकैं ।
आस्रव पछार्यौ रन-थंभ तोरि डार्यौ ताहि,
निरखि बनारसी नमत कर जोरिकै ॥२॥