
जेते मनगोचर प्रगट-बुद्धि-पूरवक,
तिह परिनामनकी मतता हरतु है ।
मनसौं अगोचर अबुद्धि-पूरवक भाव,
तिनके विनासिवेकौं उद्दिम धरतु है ॥
याही भांति पर परनतिकौ पतन करै,
मोखकौ जतन करै भौ-जल तरतु है ।
ऐसे ज्ञानवंत ते निरास्रव कहावैं सदा,
जिन्हिकौ सुजस सुविचच्छन करतु है ॥५॥