((सवैया तेवीसा))
ज्यौं जगमैं विचरै मतिमंद,
सुछंद सदा वरतै बुध तैसो ।
चंचल चित्त असंजित वैन,
सरीर-सनेह जथावत जैसो ॥
भोग संजोग परिग्रह संग्रह,
मोह विलास करै जहं ऐसो ।
पूछत सिष्य आचारजसौं यह,
सम्यकवंत निरास्रव कैसो ॥6॥