
जे केई निकटभव्यरासी जगवासी जीव,
मिथ्यामतभेदि ज्ञान भाव परिनए हैं ।
जिन्हिकी सुदृष्टिमैं न राग द्वेष मोह कहूं,
विमल विलोकनिमैं तीनौं जीति लए हैं ॥
तजि परमाद घट सोधि जे निरोधि जोग,
सुद्ध उपयोगकी दसामैं मिलि गए हैं ।
तेई बंधपद्धति विदारि परसंग डारि,
आपमैं भगत ह्वैकै आपरूप भए हैं ॥११॥