((सवैया इकतीसा))
जेते जीव पंडित खयोपसमी उपसमी,
तिन्हकी अवस्था ज्यौं लुहारकी संडासी है ।
खिन आगमांहि खिन पानीमांहि तैसैं एऊ,
खिनमैं मिथ्यात खिन ज्ञानकला भासी है ॥
जौलौं ज्ञान रहैं तौलौं सिथिल चरन मोह,
जैसैं कीले नागकी सकति गति नासी है ।
आवत मिथ्यात तब नानारूप बंध करै,
ज्यौं उकीले नागकी सकति परगासी है ॥12॥