
करमके चक्रमैं फिरत जगवासी जीव,
ह्वै रह्यौ बहिरमुख व्यापत विषमता ।
अंतर सुमति आई विमल बड़ाई पाई,
पुद्गलसौं प्रीति टूटी छूटी माया ममता ॥
सुद्धनै निवास कीनौ अनुभौ अभ्यास लीनौ,
भ्रमभाव छोड़ि दीनौ भीनौ चित्त समता ।
अनादि अनंत अविकलप अचल ऐसौ,
पद अवलंबि अवलोकै राम रमता ॥१४॥