
जाके परगासमैं न दीसैं राग द्वेष मोह,
आस्रव मिटत नहि बंधकौ तरस है ।
तिहूं काल जामै प्रतिबिंबित अनंतरूप,
आपहूं अनंत सत्ता नंततैं सरस है ॥
भावश्रुत ज्ञान परवान जो विचारि वस्तु,
अनुभौ करै न जहां बानीकौ परस है ।
अतुल अखंड अविचल अविनासी धाम,
चिदानंद नाम ऐसौ सम्यक दरस है ॥१५॥