
आतमको अहित अध्यातमरहित ऐसौ,
आस्रव महातम अखंड अंडवत है।
ताकौ विसतार गिलिबेकौं परगट भयौ,
ब्रहमंडकौ विकासी ब्रहमंडवत है ॥
जामै सब रूप जो सबमैं सबरूपसौ पै,
सबनिसौं अलिप्त आकास-खंडवत है।
सोहै ज्ञानभान सुद्ध संवरकौ भेष धरै,
ताकी रुचि-रेखकौ हमारी दंडवत है ॥२॥