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(सवैया इकतीसा)
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सुद्ध सुछंद अभेद अबाधित, भेद-विज्ञान सुतीछन आरा ।
अंतरभेद सुभाव विभाऊ, करै जड़-चेतनरूप दुफारा ॥
सो जिन्हके उरमैं उपज्यौ, न रुचै तिन्हकौं परसंग-सहारा ।
आतमकौ अनुभौ करि ते, हरखैं परखैं परमातम-धारा ॥३॥