
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ द्रव्यैर्द्रव्यान्तरस्यारम्भं द्रव्यादर्थान्तरत्वं च सत्तया: प्रतिहन्ति - न खलु द्रव्यैर्द्रव्यान्तराणामारम्भ:, सर्वद्रव्याणां स्वभावसिद्धत्वात् । स्वभावसिद्धत्वं तु तेषामनादिनिधनत्वात् । अनादिनिधनं हि न साधनान्तरमपेक्षते । गुणपर्यायात्मानमात्मन: स्वभावमेव मूलसाधनमुपादाय स्वयमेव सिद्धसिद्धिमद्भूतं वर्तते । यत्तु द्रव्यैरारभ्यते न तद्द्रव्यान्तरं कादाचित्कत्वात् स पर्याय:; द्वयणुकादिवन्मनुष्यादिवच्च । द्रव्यं पुनरनवधि त्रिसमयावस्थायि न तथा स्यात् । अथैवं यथा सिद्धं स्वभावत एव द्रव्यं तथा सदित्यपि तत्स्वभावत एव सिद्धमित्य-वधार्यताम् । सत्तत्मनात्मन: स्वभावेन निष्पन्ननिष्पत्तिमद्भावयुक्तत्वात् । न च द्रव्यादर्थान्तरभूता सत्तेपपत्तिमभिप्रपद्यते, यतस्तत्समवायात्तत्सदिति स्यात् । सत: सत्तयाश्च न तावद्युतसिद्धत्वेनार्थान्तरत्वं, तयोर्दण्डदण्डिवद्युतसिद्धस्यादर्शनात् अयुतसिद्धत्वेनापि न तदुपपद्यते । इहेदमितिप्रतीतेरुत्पद्यत इति चेत् किंनिबन्धना हीदमिति प्रतीति: ।भेदनिबन्धनेति चेत् को नाम भेद: । प्रादेशिक अताद्भाविको वा । न तावत्प्रादेशिक:, पूर्वमेव युतसिद्धत्वस्यापसारणात् । अताद्भाविकश्चत उपपन्न एव यद्द्रव्यं तन्न गुण इति वचनात् । अयं तु न खल्वेकान्तेनेहेदमितिप्रतीतेर्निबन्धनं, स्वयमेवोन्मग्ननिमग्नत्वात् । तथाहि - यदैव पर्यायेणार्प्यते द्रव्यं तदैव गुणवदिदं द्रव्यमयमस्य गुण:, शुभ्रमिदमुत्तरीय- मयमस्य शुभ्रो गुण इत्यादिवदताद्भाविको भेद उन्मज्जति । यदा तु द्रव्येणार्प्यते द्रव्यं तदास्तमितसमस्तगुणवासनोन्मेषस्य तथाविधं द्रव्यमेव शुभ्रमुत्तरीयमित्यादिवत्प्रपश्यत: समूल एवा-ताद्भाविको भेदो निमज्जति । एवं हि भेदे निमज्जति तत्प्रत्यया प्रतीतिर्निमज्जति । तस्यां निमज्जत्यामयुतसिद्धत्वोत्थमर्थान्तरत्वं निमज्जति । तत: समस्तमपि द्रव्यमेवैकं भूत्वावतिष्ठते । यदा तु भेद उन्मज्जति, तस्मिन्नुन्मज्जति तत्प्रत्यया प्रतीतिरुन्मज्जति । तस्यामुन्मज्जत्यामयुतसिद्धत्वोत्थमर्थान्तरत्वमुन्मज्जति । तदापि तत्पर्यायत्वेनोन्मज्जज्जलराशेर्जलकल्लोल इव द्रव्यान्न व्यतिरिक्तं स्यात् । एवं सति स्वयमेव सद्द्रव्यं भवति । यस्त्वेवं नेच्छति स खलु परसमय एव द्रष्टव्य: ॥९८॥ वास्तव में द्रव्यों से द्रव्यान्तरों की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि सर्व द्रव्य स्वभावसिद्ध हैं । (उनकी) स्वभावसिद्धता तो उनकी अनादिनिधनता से है; क्योंकि १अनादिनिधन साधनान्तर की अपेक्षा नहीं रखता । वह गुण-पर्यायात्मक ऐसे अपने स्वभाव को ही -- जो कि मूल साधन है उसे धारण करके स्वयमेव सिद्ध हुआ वर्तता है । जो द्रव्यों से उत्पन्न होता है वह तो द्रव्यान्तर नहीं है, २कादाचित्कपने के कारण पर्याय है; जैसे -- द्विअणुक इत्यादि तथा मनुष्य इत्यादि । द्रव्य तो अनवधि (मर्यादा रहित) त्रिसमय—अवस्थायी (त्रिकालस्थायी) होने से उत्पन्न नहीं होता । अब इस प्रकार—जैसे द्रव्य स्वभाव से ही सिद्ध है उसी प्रकार (वह) 'सत् है' ऐसा भी उसके स्वभाव से ही सिद्ध है, ऐसा निर्णय हो; क्योंकि सत्तात्मक ऐसे अपने स्वभाव से निष्पन्न हुए भाव वाला है (द्रव्य का ‘सत् है’ ऐसा भाव द्रव्य के सत्तास्वरूप स्वभाव का ही बना हुआ है) । द्रव्य से अर्थान्तरभूत सत्ता उत्पन्न नहीं है (नहीं बन सकती, योग्य नहीं है) कि जिसके समवाय से वह (द्रव्य) ‘सत्’ हो । (इसी को स्पष्ट समझाते हैं):— प्रथम तो ३सत् से ४सत्ता की ५युतसिद्धता से अर्थान्तरत्व नहीं है, क्योंकि दण्ड और दण्डी की भांति उनके सम्बन्ध में युतसिद्धता दिखाई नहीं देती । (दूसरे) अयुतसिद्धता से भी वह (अर्थान्तरत्व) नहीं बनता । 'इसमें यह है (अर्थात् द्रव्य में सत्ता है)' ऐसी प्रतीति होती है इसलिये वह बन सकता है,—ऐसा कहा जाये तो (पूछते हैं कि) 'इसमें यह है' ऐसी प्रतीति किसके आश्रय (कारण) से होती है यदि ऐसा कहा जाये कि भेद के आश्रय से (अर्थात् द्रव्य और सत्ता में भेद होने से) होती है तो, वह कौनसा भेद है ? प्रादेशिक या अताद्भाविक ? ६प्रादेशिक तो है नहीं, क्योंकि युतसिद्धत्व पहले ही रद्द (नष्ट, निरर्थक) कर दिया गया है, और यदि ७अताद्भाविक कहा जाये तो वह उपपन्न ही (ठीक ही) है, क्योंकि ऐसा (शास्त्र का) वचन है कि 'जो द्रव्य है वह गुण नहीं है ।' परन्तु (यहाँ भी यह ध्यान में रखना कि) यह अताद्भाविक भेद 'एकान्त से इसमें यह है' ऐसी प्रतीति का आश्रय (कारण) नहीं है, क्योंकि वह (अताद्भाविक भेद) स्वयमेव ८उन्मग्न और ९निमग्न होता है । वह इस प्रकार है :-
१अनादिनिधन = आदि और अन्त से रहित । (जो अनादि-अनन्त हो उसकी सिद्धि के लिये अन्य साधन की आवश्यकता नहीं है) । २कादाचित्क = कदाचित्-किसीसमय हो ऐसा; अनित्य । ३सत् = अस्तित्ववान - अर्थात् द्रव्य । ४सत्ता = अस्तित्व (गुण) । ५युतसिद्ध = जुड़कर सिद्ध हुआ; समवाय से-संयोग से सिद्ध हुआ । (जैसे लाठी और मनुष्य के भिन्न होने पर भी लाठी के योग से मनुष्य 'लाठीवाला' होता है, इसीप्रकार सत्ता और द्रव्य के अलग होने पर भी सत्ता के योग से द्रव्य 'सत्तावाला' (सत्) हुआ है ऐसा नहीं है । लाठी और मनुष्य की भाँति सत्ता और द्रव्य अलग दिखाई ही नहीं देते । इसप्रकार 'लाठी' और 'लाठीवाले' की भाँति 'सत्ता' और 'सत्' के सम्बन्ध में युतसिद्धता नहीं है । ६द्रव्य और सत्ता में प्रदेश-भेद नहीं है; क्योंकि प्रदेश-भेद हो तो युतसिद्धत्व आये, जिसको पहले ही रद्द करके बताया है । ७द्रव्य वह गुण नहीं है और गुण वह द्रव्य नहीं है, - ऐसे द्रव्य-गुण के भेद को (गुण-गुणी- भेद को) अताद्भाविक (तद्रूप न होनेरूप) भेद कहते हैं । यदि द्रव्य और सत्ता में ऐसा भेद कहा जाय तो वह योग्य ही है । ८उन्मग्न होना = ऊपर आना; तैर आना; प्रकट होना (मुख्य होना) । ९निमग्न होना = डूब जाना (गौण होना) । १०गुण-वासना के उन्मेष = द्रव्य में अनेक गुण होने के अभिप्राय की प्रगटता; गुण-भेद होने-रूप मनो-वृत्ति के (अभिप्राय के) अंकुर । |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ यथा द्रव्यं स्वभावसिद्धं तथा तत्सदपि स्वभावत एवेत्याख्याति -- दव्वं सहावसिद्धं द्रव्यं परमात्मद्रव्यं स्वभावसिद्धं भवति । कस्मात् । अनाद्यनन्तेन परहेतुनिरपेक्षेण स्वतः सिद्धेन केवलज्ञानादिगुणाधारभूतेन सदानन्दैकरूपसुखसुधारसपरम-समरसीभावपरिणतसर्वशुद्धात्मप्रदेशभरितावस्थेन शुद्धोपादानभूतेन स्वकीयस्वभावेन निष्पन्नत्वात् । यच्च स्वभावसिद्धं न भवति तद्द्रव्यमपि न भवति । द्वयणुकादिपुद्गलस्कन्धपर्यायवत्मनुष्यादिजीवपर्यायवच्च । सदिति यथा स्वभावतः सिद्धं तद्द्रव्यं तथा सदिति सत्तालक्षणमपि स्वभावत एव भवति, न च भिन्नसत्तासमवायात् । अथवा यथा द्रव्यं स्वभावतः सिद्धं तथा तस्य योऽसौसत्तागुणः सोऽपि स्वभावसिद्ध एव । कस्मादिति चेत् । सत्ताद्रव्ययोः संज्ञालक्षणप्रयोजनादिभेदेऽपिदण्डदण्डिवद्भिन्नप्रदेशाभावात् । इदं के कथितवन्तः । जिणा तच्चदो समक्खादा जिनाः कर्तारः तत्त्वतःसम्यगाख्यातवन्तः कथितवन्तः सिद्धं तह आगमदो सन्तानापेक्षया द्रव्यार्थिकनयेनानादिनिधनागमादपितथा सिद्धं णेच्छदि जो सो हि परसमओ नेच्छति न मन्यते य इदं वस्तुस्वरूपं स हि स्फुटं परसमयो मिथ्यादृष्टिर्भवति । एवं यथा परमात्मद्रव्यं स्वभावतः सिद्धमवबोद्धव्यं तथा सर्वद्रव्याणीति । अत्र द्रव्यंकेनापि पुरुषेण न क्रियते । सत्तागुणोऽपि द्रव्याद्भिन्नो नास्तीत्यभिप्रायः ॥१०८॥ [दव्वं सहावसिद्धं] द्रव्य-परमात्मद्रव्य स्वभावसिद्ध है । परमात्मद्रव्य स्वभावसिद्ध कैसे है? अनादि-अनन्त अन्य कारणों से निरपेक्ष स्वयं से ही सिद्ध केवलज्ञानादि गुणों के आधारभूत, हमेशा आनंदमयी एकरूप सुखरूपी अमृतरसमयी परमसमतारस भाव से परिणत सभी शुद्धात्म प्रदेशो में परिपूर्ण भरे हुए शुद्ध उपादानभूत अपने स्वभाव से निष्पन्न होने के कारण परमात्मद्रव्य स्वभावसिद्ध है । और जो स्वभावसिद्ध नहीं है वह द्रव्य भी नहीं है । द्वयणुक आदि पुद्गलस्कंध पर्यायों के समान और मनुष्यादि जीव पर्यायों के समान स्वभाव-सिद्ध नहीं होने वाला द्रव्य भी नहीं है । [सदिति] जैसे जो स्वभाव से सिद्ध है वह द्रव्य है, उसी प्रकार 'सत्' ऐसा सत्ता का लक्षण भी स्वभाव से ही है, भिन्न सत्ता के समवाय से सत् नहीं है । अथवा, जैसे द्रव्य स्वभाव से ही सिद्ध है, उसी प्रकार उसका जो वह सत्ता गुण है वह भी स्वभावसिद्ध ही है । द्रव्य के समान उसका गुण सत् स्वभावसिद्ध कैसे है? यदि प्रश्न हो तो- सत्ता और द्रव्य के संज्ञा, लक्षण, प्रयोजन आदि का भेद होने पर भी दण्ड और दण्डी के समान प्रदेश भेद का अभाव होने से; द्रव्य का गुण होने से; द्रव्य के समान सत् भी स्वभावसिद्ध है । उपर्युक्त यह सब कौन कहते हैं? [जिणा तच्चदो समक्खादा] जिनेन्द्र भगवान रूप कर्ता वास्तव में भलीभांति यह कहते हैं, [सिद्धं तह आगमदो] द्रव्यार्थिकनय से परम्परा की अपेक्षा अनादि-अनन्त आगम से भी वैसा ही सिद्ध है, [णेच्छदि जो सो हि परसमओ] जो इस वस्तुस्वरूप को नहीं मानता है, वह स्पष्ट परसमय-मिथ्यादृष्टि है । इसप्रकार जैसे परमात्मद्रव्य स्वभाव से सिद्ध है, उसीप्रकार सभी द्रव्यों को जानना चाहिये । यहाँ, द्रव्य किसी भी पुरुष के द्वारा नहीं किया गया है, सत्ता गुण भी द्रव्य से भिन्न नहीं है - यह अभिप्राय है ॥१०८॥ |