+ शुद्धात्मा को छोड़ कुछ और भावना मत कर -
करि सिव-संगमु एक्कु पर जहिँ पाविज्जइ सुक्खु ।
जोइय अण्णु म चिंति तुहुँ जेण ण लब्भइ मुक्खु ॥146॥
कुरु शिवसंगमं एकं परं यत्र प्राप्यते सुखम् ।
योगिन् अन्यं मा चिन्तय त्वं येन न लभ्यते मोक्षः ॥१४६॥
अन्वयार्थ : [योगिन्] हे योगी ! [त्वं एकं शिवसंगमं] तू एक निजशुद्धात्मा की ही भावना [परं] केवल [कुरु] कर, [यत्र] जिसमें कि [सुखम् प्राप्येत]
अतीन्द्रिय सुख पावे, [अन्यं मा] अन्य कुछ भी मत [चिंतय] चिंतवन कर, [येन] जिससे कि [मोक्षः न लभ्यते] मोक्ष न मिले ।
Meaning : Meditate on the pure nature of thy soul alone, so that thou mightst obtain Bliss ; thou shouldst not think of anything else, because by thinking of other objects, thou wilt not obtain Moksha.

  श्रीब्रह्मदेव