
बलि किउ माणुस-जम्मडा देक्खंतहँ पर सारु ।
जइ उट्ठब्भइ तो कुहइ अह डज्झइ तो छारु ॥147॥
बलिः क्रियते मनुष्यजन्म पश्यतां परं सारम् ।
यदि अवष्टभ्यते ततः क्वथति अथ दह्यते तर्हि क्षारः ॥१४७॥
अन्वयार्थ : [मनुष्यजन्म] इस मनुष्य-जन्म को [बलिः क्रियते] मोक्ष के लिए समर्पित करो, जो कि [पश्यतां परं सारम्] देखने में केवल सार दिखता है, [यदि अवष्टभ्यते] जो इस मनुष्य-देह को भूमि में गाड़ दिया जावे, [ततः] तो [क्वथति] सड़कर दुर्गन्धरूप परिणमे, [अथ] और जो [दह्यते] जलाईये [तर्हि] तो [क्षारः] राख हो जाता है ।
Meaning : What a wonderful thing is the body of man? In appearance, it looks very beautiful, but if its skin be taken off, it will look very loathsome; fire reduces it to ashes at once.
श्रीब्रह्मदेव