
उव्वलि चोप्पडि चिट्ठ करि देहि सु-मिट्ठाहार ।
देहहँ सयल णिरत्थ गय जिमु दुज्जणि उवयार ॥148॥
उद्वर्तय म्रक्षय चेष्टां कुरु देहि सुमृष्टाहारान् ।
देहस्य सकलं निरर्थ गतं यथा दुर्जने उपकाराः ॥१४८॥
अन्वयार्थ : [देहस्य] इस देह का [उद्वर्तय] उबटना करो, [म्रक्षय] तैलादिक का मर्दन करो, [चेष्टां कुरु] श्रृंगार आदि से अनेक प्रकार सजाओ, [सुमृष्टाहारान्] अच्छे-अच्छे मिष्ट आहार [देहि] दो, लेकिन [सकलं] ये सब [निरर्थ गतं] यत्न व्यर्थ हैं, [यथा] जैसे [दुर्जने] दुर्जनों का [उपकाराः] उपकार करना वृथा है ।
Meaning : Washing the body, applying oil and cosmetics, etc., to it, and nourishing it with relishable food, -all these are useless; just as it is sinful to help a man of evil motive.
श्रीब्रह्मदेव