+ अशुचि शरीर से प्रीति मत कर -
जेहउ जज्जरु णरय-घरु तेहउ जोइय काउ ।
णरइ णिरंतरु पूरियउ किम किज्जइ अणुराउ ॥149॥
यथा जर्जरं नरकगृहं तथा योगिन् कायः ।
नरके निरन्तरं पूरितं किं क्रियते अनुरागः ॥१४९॥
अन्वयार्थ : [योगिन्] हे योगी, [यथा] जैसा [जर्जरं] सैकड़ों छेदोंवाला [नरकगृहं] नरक-घर है, [तथा] वैसे [नरके] मल-मूत्रादि से [निरंतरं] हमेशा [पूरितं] भरा हुए [कायः] शरीर से [अनुरागः] प्रीति [किं क्रियते] कैसे की जावे ?
Meaning : As a vessel of ilth, with holes in it, always passes filth through those holes, so does the body ever pass filth and urine through its holes,-how should such a body be loved ?

  श्रीब्रह्मदेव