
दुक्खइँ पावइँ असुचियइँ तिहुयणि सयलइँ लेवि ।
एयहिँ देहु विणिम्मियउ विहिणा वइरु मुणेवि ॥150॥
दुःखानि पापानि अशुचीनि त्रिभुवने सकलानि लात्वा ।
एतैः देहः विनिर्मितः विधिना वैरं मत्वा ॥१५०॥
अन्वयार्थ : [त्रिभुवने] तीन लोक के [दुःखानि पापानि अशुचीनि] दुःख, पाप, और अशुचिता [सकलानि लात्वा] सबको लेकर [एतैः] इन मिले हुओं से [विधिना] विधाता ने [वैरं] वैर [मत्वा] मानकर [देहः] शरीर [निर्मितः] बनाया है ।
Meaning : Karmas, being enemies of Jiva , have collected the material of pain and sin and impurity and made a body for it.
श्रीब्रह्मदेव