
जोइय देहु घिणावणउ लज्जहि किं ण रमंतु ।
णाणिय धम्में रइ करहि अप्पा विमलु करंतु ॥151॥
योगिन् देहः घृणास्पदः लज्जसे किं न रममाणः ।
ज्ञानिन् धर्मेण रतिं कुरु आत्मानं विमलं कुर्वन् ॥१५१॥
अन्वयार्थ : [योगिन्] हे योगी ! [देहः] यह शरीर [धृणास्पदः] घिनावना है, [रममाणः] इस देह से रमते हुए [किं न लज्जसे] लाज नहीं आती ? [ज्ञानिन्] हे ज्ञानी ! [आत्मानं] आत्मा को [विमलं कुर्वन्] निर्मल करने वाले [धर्मे] धर्म से [रतिं] प्रीति [कुरु] कर ।
Meaning : O wise soul ! Be ashamed of loving such a loathsome body ; why dost thou take delight in it; give up its attachment and perform Dharma to purify thy self.
श्रीब्रह्मदेव