+ आत्मा को ज्ञानादि गुणमय देख -
जोइय देहु परिच्चयहि देहु ण भल्लउ होइ ।
देह-विभिण्णउ णाणमउ सो तुहुँ अप्पा जोइ ॥152॥
योगिन् देहं परित्यज देहो न भद्रः भवति ।
देहविभिन्नं ज्ञानमयं तं त्वं आत्मानं पश्य ॥१५२॥
अन्वयार्थ : [योगिन्] हे योगी ! [देहं परित्यज] शरीर से प्रीति छोड़, [देहः भद्रः न भवति] यह देह अच्छा नहीं है, [देहविभिन्नं ज्ञानमयं] देह से भिन्न ज्ञानादि गुणमय [तं आत्मानं] ऐसे आत्मा को [त्वं पश्य] तू देख ।
Meaning : Renounce the attachment of thy body; it is not good; thy Jnana-Maee Atman is Bhinna (distinct) from this body; seek for that very Atman in thy self.

  श्रीब्रह्मदेव