
दुक्खहँ कारणु मुणिवि मणि देहु वि एहु चयंति ।
जित्थु ण पावहिँ परम-सुहु तित्थु कि संत वसंति ॥153॥
दुःखस्य कारणं मत्वा मनसि देहमपि इमं त्यजन्ति ।
यत्र न प्राप्नुवन्ति परमसुखं तत्र किं सन्तः वसन्ति ॥१५३॥
अन्वयार्थ : [दुःखस्य कारणं] दुःख का कारण [इमं देहमपि] इसदेह को [मनसि] मन में [मत्वा] जानकर ज्ञानी जीव [त्यजंति] इसका ममत्व छोड़ देते हैं, क्योंकि [यत्र] जिस देहमें [परमसुखं न प्राप्नुवंति] उत्तम सुख नहीं पाते, [तत्र संतः किं वसंति] उसमें सत्पुरुष कैसे रह सकते हैं ?
Meaning : Saints knowing the body to be the cause of pain, give up its attachment. How can the wise love that which does not conduce to Parama-Sukha .
श्रीब्रह्मदेव