
सुण्णउँ पउँ झायंताहँ वलि वलि जोइयडाहँ ।
समरसि-भाउ परेण सहु पुण्णु वि पाउ ण जाहँ ॥159॥
शून्यं पदं ध्यायतां पुनः पुनः (?) योगिनाम् ।
समरसीभावं परेण सह पुण्यमपि पापं न येषाम् ॥१५९॥
अन्वयार्थ : [शून्यं पदं ध्यायतां] विकल्प-रहित पद को ध्यावने वाले [योगिनाम्] योगियों की [बलिं बलिं] बार-बार पूजा करता हूँ, [येषाम्] जिनके [परेण सह] अन्य पदार्थों के साथ [समरसीभावं] समरसीभाव है, और [पुण्यम् पापं अपि न] जिनके पुण्य और पाप दोनों नहीं हैं ।
Meaning : I highly praise those Yogins who are free from Punya and Papa and who purging their minds of Shubha and Ashubha thoughts contemplate upon their Shuddha Atman .
श्रीब्रह्मदेव