+ प्रभाकर भट्ट द्वारा विनती -
देहि वसंतु वि णवि मुणिउ अप्पा देउ अणंतु ।
अंबरि समरसि मणु धरिवि सामिय णट्ठु णिभंतु ॥165॥
देहे वसन्नपि नैव मतः आत्मा देवः अनन्तः ।
अम्बरे समरसे मनः धृत्वा स्वामिन् नष्टः निर्भ्रान्तः ॥१६५॥
अन्वयार्थ : [स्वामिन्] हे स्वामी ! [देहे वसन्नपि] देह में रहता हुआ भी [समरसे] समान भावरूप [अंबरे] निर्विकल्प-समाधि में [मनः धृत्वा] मन लगा कर [आत्मा देवः] आराधने योग्य आत्मा [अनंतः] अनंत [नैव मतः] मैंने नहीं जाना और [नष्टो निर्भ्रांतः] निस्संदेह नष्ट हुआ ।
Meaning : O master! I have wasted my time in vain, and have not known the Atman possessing infinite attributes and powers dwelling in my own body; I have not adopted Akasa-like Samabhava (tranquillity).

  श्रीब्रह्मदेव