
दाणु ण दिण्णउ मुणिवरहँ ण वि पुज्जिउ जिण-णाहु ।
पंच ण वंदिय परम-गुरू किमु होसइं सिव-लाहु ॥168॥
दानं न दत्तं मुनिवरेभ्यः नापि पूजितः जिननाथः ।
पञ्च न वन्दिताः परमगुरवः किं भविष्यति शिवलाभः ॥१६८॥
अन्वयार्थ : [दानं] आहारादि दान [मुनिवराणां] मुनिश्वर आदि पात्रों को [न दत्तं] नहीं दिया, [जिननाथः] जिनेन्द्र-भगवान को भी [नापि पूजितः] नहीं पूजा, [पंच परमगुरवः] अरहंत आदिक पंच-परमेष्ठी [न वंदिताः] भी नहीं पूजे, तब [शिवलाभः] मोक्ष की प्राप्ति [किं भविष्यति] कैसे हो सकती है ?
Meaning : How will Moksha be obtained by him who has not given Dana to Munis , nor worshipped Shri Jinendra Deva, nor paid homage to the Pancha-Parmeshti?
श्रीब्रह्मदेव