
जोइय मिल्लहि चिन्त जइ तो तुट्टइ संसारु ।
चिंतासत्तउ जिणवरु वि लहइ ण हंसाचारु ॥170॥
योगिन् मुञ्चसि चिन्तां यदि ततः त्रुटयति संसारः ।
चिन्तासक्तो जिनवरोऽपि लभते न हंसाचरम् ॥१७०॥
अन्वयार्थ : [योगिन्] हे योगी ! [यदि] जो [चिंतां मुंचसि] चिन्ताओं को छोड़े [ततः] तो [संसारः] संसार का भ्रमण [त्रुटयति] छूट जायेगा; [चिंतासक्तः] चिन्ता में लगे हुए [जिनवरोऽपि] जिनदेव भी [हंसाचारम् न लभते] परमात्मा के आचरणरूप शुद्ध-भावों को नहीं पाते ।
Meaning : If thou wilt give up Chinta , thy transmigration will come to an end ; the Jinendra Bhagwan also, so-long as he was associated with Chinta could not obtain his Atma-Swarupa .
श्रीब्रह्मदेव