+ मन को मारकर परब्रह्म का ध्यान करो -
जोइय दुम्मइ कवुण तुहँ भवकारणि ववहारि ।
बंभु पवंचहिँ जो रहिउ सो जाणिवि मणु मारि ॥171॥
योगिन् दुर्मतिः का तव भवकारणे व्यवहारे ।
ब्रह्म प्रपंचैर्यद् रहितं तत् ज्ञात्वा मनो मारय ॥१७१॥
अन्वयार्थ : [योगिन्] हे योगी ! [तव का दुर्मतिः] तेरी क्या खोटी बुद्धि है, जो तू [भवकारणे व्यवहारे] संसार के कारण उद्यमरूप व्यवहार करता है; अब तू [प्रपंचैः रहितं] (माया-जालरूप) पाखंडों से रहित [यत् ब्रह्म] जो शुद्धात्मा है, [तत् ज्ञात्वा] उसको जानकर [मनो मारय] (विकल्प-जालरूपी) मन को मार ।
Meaning : O soul! What foolishness has entered thy head that thou engagest thyself in Vyavahara (good and bad actions, etc.) which is the cause of SamsaraParibrahmana (transmigratory condition); know thy Shuddha Atman which is devoid of all Pra-Pancha (worldly turmoils) and is described by the word Brahma, and make thy mind steady.

  श्रीब्रह्मदेव