
सव्वहिँ रायहिँ छहिँ रसहिँ पंचहिँ रूवहिँ जंतु ।
चित्तु णिवारिवि झाहि तुहुँ अप्पा देउ अणंतु ॥172॥
सर्वैः रागैः षड्भिः रसैः पञ्चभिः रूपैः गच्छत् ।
चित्तं निवार्य ध्याय त्वं आत्मानं देवमनन्तम् ॥१७२॥
अन्वयार्थ : [त्वं सर्वैः रागैः] तू सब शुभाशुभ राग से, [षड्भिःरसैः] छहों रस से, [पंचभिः रसैः] पाँचों रस से [गच्छत् चित्तं] चलायमान चित्त को [निवार्य] रोककर [अनंतम्] अनंतगुणवाले [आत्मानं देवम् ध्याय] आत्मदेव का चिंतवन कर ।
Meaning : Removing from thy mind all kinds of Raga , six kinds of tastes, and five kinds of colours, meditate upon thy Atman, which is Ananta Deva .
श्रीब्रह्मदेव