+ आत्मा को जिसरूप से ध्यावो, उसी-रूप परिणमता है -
जेण सरूविं झाइयइ अप्पा एहु अणंतु ।
तेण सरूविं परिणवइ जह फलिहउ-मणि मंतु ॥173॥
येन स्वरूपेण ध्यायते आत्मा एषः अनन्तः ।
तेन स्वरूपेण परिणमति यथा स्फटिकमणिः मन्त्रः ॥१७३॥
अन्वयार्थ : [एषः] यह प्रत्यक्षरूप [अनंतः] अविनाशी [आत्मा] आत्मा [येनस्वरूपेण] जिस स्वरूप से [ध्यायते] ध्याया जाता है, [तेन स्वरूपेण] उसी स्वरूप [परिणमति] परिणमता है, [यथा स्फ टिकमणिः मंत्रः] जैसे स्फटिकमणि और गारुड़ी आदि मंत्र हैं ।
Meaning : This Ananta Aiman (infinite soul) is transformed into what it thinks of, just as Sphatika-Mani (crystal) assumes the colour of the flower in conjunction with which it is placed.

  श्रीब्रह्मदेव