+ विपरीत परिस्थितियों में आत्म-तत्त्व की भावना -
णिट्ठुर-वयणु सुणेवि जिय जइ मणि सहण ण जाइ ।
तो लहु भावहि बंभु परु जिं मणु झत्ति विलाइ ॥184॥
निष्ठुरवचनं श्रुत्वा जीव यदि मनसि सोढुं न याति ।
ततो लघु भावय ब्रह्म परं येन मनो झटिति विलीयते ॥१८४॥
अन्वयार्थ : [जीव] हे जीव ! [निष्ठुरवचनं श्रुत्वा] कठोर वचन सुनकर [यदि] जो [न सोढुं याति] न सह सके, [ततः] तो [परं ब्रह्म] (परमानंदस्वरूप इस देह में विराजमान) परमब्रह्म का [मनसि] मन में [लघु] शीघ्र [भावय] ध्यान करो [येन] जिससे [मनः झटिति] मन शीघ्र ही [विलीयते] विलीन हो जाता है ।
Meaning : O soul! If thy mind_cannot bear painful words, then be immersed in the meditation of Parama-Brahma or Pure Self, so that thow mightst attain to happiness.

  श्रीब्रह्मदेव