+ कोई दोष ग्रहण करे तो क्षमाभाव रखे -
अवगुण-गहणइँ महुतणइँ जइ जीवहँ संतोसु ।
तो तहँ सोक्खहं हेउ हउँ इउ मण्णिवि चइ रोसु ॥186॥
अवगुणग्रहणेन मदीयेन यदि जीवानां संतोषः ।
ततः तेषां सुखस्य हेतुरहं इति मत्वा त्यज रोषम् ॥१८६॥
अन्वयार्थ : [मदीयेन अवगुणग्रहणेन] मेरे दोष ग्रहण करके [यदि जीवानां संतोषः] यदि जीवों को हर्ष होता है, [ततः] तो मुझे यही लाभ है, कि [अहं] मैं [तेषां सुखस्य हेतुः] उनको सुख का कारण हुआ, [इति मत्वा] ऐसा मन में विचारकर [रोषम् त्यज] गुस्सा छोड़ो ।
Meaning : Those who speak ill of me become happy by doing so, and as I become the cause of their happiness, I should not become angry with them, I should rather become contented.

  श्रीब्रह्मदेव