+ सब चिंताओं का निषेध -
जोइय चिंति म किं पि तुहुँ जइ बीहउ दुक्खस्स ।
तिल-तुस-मित्तु वि सल्लडा वेयण करइ अवस्स ॥187॥
योगिन् चिन्तय मा किमपि त्वं यदि भीतः दुःखस्य ।
तिलतुषमात्रमपि शल्यं वेदनां करोत्यवश्यम् ॥१८७॥
अन्वयार्थ : [योगिन्] हे योगी ! [किमपि मा चिंतय] कुछ भी चिंता मत कर [त्वं यदि] यदि तू [दुःखस्य] दुःख से [भीतः] डरकर [तिलतुषमात्रमपि शल्यं] तिल के भूसे मात्र शल्य भी [वेदनां] मनको वेदना [अवश्यम् करोति] निश्चयसे करती है ।
Meaning : If thou art afraid of pain then give up every sort of care or anxiety ; as even a little thorn is painful, so, too, is slight Chinta (care or anxiety) the source of pain.

  श्रीब्रह्मदेव