
परम-समाहि-महा-सरहिँ जे बुड्डहिँ पइसेवि ।
अप्पा थक्कइ विमलु तहँ भव-मल जंति वहेवि ॥189॥
परमसमाधिमहासरसि ये मज्जन्ति प्रविश्य ।
आत्मा तिष्ठति विमलः तेषां भवमलानि यान्ति ऊढ्वा ॥१८९॥
अन्वयार्थ : [ये] जो कोई महान पुरुष [परमसमाधिमहासरसि] परम-समाधिरूप सरोवर में [प्रविश्य] घुसकर [मज्जन्ति] मग्न होते हैं, [आत्मा तिष्ठति] आत्मा में स्थिर होते हैं [विमलः] द्रव्यकर्म, भावकर्म, नोकर्म से रहित, [तेषां] उन्हीं पुरुषों के [भवमलानि] अशुद्ध भाव के कारण जो कर्म हैं, वे सब [ऊढ्वा / बहित्वा यांति] बह जाते हैं ।
Meaning : One who constantly bathes in the Sarovara of Parama Samadha, washes off all the dirt of Samsara and becomes a Shuddha Atman .
श्रीब्रह्मदेव