+ समभाव बिना ज्ञान और तप व्यर्थ -
घोरु करंतु वि तव-चरणु सयल वि सत्थ मुणंतु ।
परम-समाहि-विवज्जयउ णवि देक्खइ सिउ संतु ॥191॥
घोरं कुर्वन् अपि तपश्चरणं सकलान्यपि शास्त्राणि मन्यमान ।
परमसमाधिविवर्जितः नैव पश्यति शिवं शान्तम् ॥१९१॥
अन्वयार्थ : [घोरं तपश्चरणं कुर्वन् अपि] महा दुर्धर तपश्चरण करता हुआ भी और [सकलानि शास्त्राणि] सब शास्त्रों को [जानन्] जानता हुआ भी [परमसमाधिविवर्जितः] जो परम-समाधि से रहित है, वह [शांतम् शिवं] शांतरूप शुद्धात्मा को [नैव पश्यति] नहीं देख सकता ।
Meaning : One who practises severe asceticism and has read all the Shastras, but has not established himself in Parama Samadna, cannot see his Shiva Shanta (pure, real self).

  श्रीब्रह्मदेव