
विषय-कसाय वि णिद्दलिवि जे ण समाहि करंति ।
ते परमप्पहँ जोइया णवि आराहय होंति ॥192॥
विषयकषायानपि निर्दल्य ये न समाधिं कुर्वन्ति ।
ते परमात्मनः योगिन् नैव आराधका भवन्ति ॥१९२॥
अन्वयार्थ : [ये] जो [विषयकषायानपि] विषय कषायों को [निर्दल्य] मूल से उखाड़कर [समाधिं] परमसमाधि को [न कुर्वंति] नहीं धारण करते, [ते] वे [योगिन्] हे योगी, [परमात्माराधकाः] परमात्मा के आराधक [नैव भवंति] नहीं हैं ।
Meaning : Those Yogins who do not annihilate Vishayas and Kashayas and who do not establish themselves in the Parama Samadhi, cannot be said to meditate on the Parama Pada .
श्रीब्रह्मदेव