+ मात्र बाह्य समाधि से कार्य की सिद्धि नहीं -
परम-समाहि धरेवि मुणि जे परबंभु ण जंति ।
ते भव-दुक्खइँ बहुविहइँ कालु अणंतु सहंति ॥193॥
परमसमाधिं धृत्वापि मुनयः ये परब्रह्म न यान्ति ।
ते भवदुःखानि बहुविधानि कालं अनन्तं सहन्ते ॥१९३॥
अन्वयार्थ : [ये मुनयः] जो कोई मुनि [परमसमाधिं] परम-समाधि को [धृत्वापि] धारण करके भी [परब्रह्म] (केवलज्ञानादि अनंतगुणरूप) निज आत्मा को [न यांति] नहीं जानते हैं, [ते] वे (शुद्धात्म-भावना से रहित पुरुष) [बहुविधानि] अनेक प्रकार के [भवदुःखानि] (नारकादि) भवदुःख आधि व्याधिरूप [अनंतं कालं] अनंतकाल तक [सहंते] भोगते हैं ।
Meaning : Those Munis who not having established them :elves in Parama Samadhi do not realize Parama Brahma, continue to bear various kinds of pain and suffering in the Samsara for a long time.

  श्रीब्रह्मदेव