
जामु सुहासुह-भावडा णवि सयल वि तुट्टंति ।
परमसमाहि ण तामुमणि केवलि एहु भणंति ॥194॥
यावत् शुभाशुभभावाः नैव सकला अपि त्रुटयन्ति ।
परमसमाधिर्न तावत् मनसि केवलिन एवं भणन्ति ॥१९४॥
अन्वयार्थ : [यावत्] जब तक [सकला अपि] समस्त ही [शुभाशुभभावाः] शुभाशुभ परिणाम [नैव त्रुटयंति] दूर न हों, [तावत्] तब तक [मनसि] चित्त में [परमसमाधिःन] परमसमाधि नहीं हो सकती [एवं] ऐसा [केवलिनः] केवली-भगवान् [भणंति] कहते हैं ।
Meaning : So long as all good and bad thoughts are not left behind, one cannot attain to the Parama Samadhi. Thus have the Kevalins said.
श्रीब्रह्मदेव